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Tuesday, April 29, 2014

जय हो

 आज जग की नाड़ियों में
चाह जय की
समाई इस तरह
स्व भी रौंदा,पर को कुचला
न रही पथ की खबर.

अपरिमित,कंटीली राह के
उस छोर पर
जो चमकता लक्ष्य-जय
बस! उसी पर नज़र
पग पगी नीरस थकन

लमकन बिखेरी
शांति झुलसे,क्रांति उपजे
जिस कौंध में
बोध है
जय हो वो कैसी?

भुस पे लीपी सी
कहीं ये जय न हो
इन्द्रियों की तुष्टि,चादरमें ढके
आत्मा के सजल से
नैन न हों

पहचान हो सत लक्ष्य की
आवर्त,पथ के
भास फिर शूल न हों
प्रिय लगे
खोखली जय-गूंज से परे
स्नेह भीगी नाद नीरव

-विन्दु