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Friday, November 22, 2013

आजादी

      माधव अपने चाचू के साथ चिड़ियाघर घूम रहा था।  बीच में ही चाचू सेघर चलने की जिद करने लगा।
चाचू ने कहा- ''बेटा इतनी दूर आए हैं,पूरा ज़ू देख तो लें। जानवरो कीगतिविधियां तो तुम्हे बहुत अच्छी लगती है। बड़ी उत्सुकता से देखा करतेथे,आज क्या हुआ तुम्हे?''

माधव ने तेवर तीखे करते हुए कहा-''चाचू मैं और आप इन कटघरों में बन्द होता तो?'

'चाचू- ''अरे बेटा! पशुओं से खुद की तुलना क्यों कर रहे हो?''
माधव-''चाचू,पशु बोल नहीं पाते तो क्या उनके हमारे तरह मन भी नहीं होता?उनका तो स्वभाव ही आजाद रहना होता है।''

उसके चाचू उसकी जिद पूरी करते हुए घर की ओर चल दिये।रास्ते में दोनो चुप थे। काफी देर बाद चुप्पी तोड़ते हुए माधव ने कहा-
''आपको याद है चाचू,सरकस में बेचारे पशु कैसे इशारे पर करतब दिखा रहेथे।''
चाचू-''हाँ बेटा यही मनुष्य की कला है जो जानवर को भी...''बीच मे ही काटते हुए माधव बोला-
''क्या कला,अबोध पशुओं की स्वतन्त्रता सेखिलवाड़ करें।पैसे कमाएं और हम लोग देख कर मस्ती करते रहें।''

इसबार उसके चाचा शान्त रहे।अभी दोनो घर पहुंचे नहीं थे कि अचानक एक मदारी दिख गया। उसके चाचा नेसोचा अब माधव पुरानी बात भूल गया होगा। अभी बच्चा ही तो है। यही सोच करचाचा ने कहा-
''माधव बंदरिया नाचते हुए देखोगे? वह देखो मदारी।"
माधव ने तपाक से उत्तर दिया-''चाचू अभी मेरे गले में जंजीर पड़ी होती,इसबंदरिया की तरह तब भी आप इतने ही खुश होते?''

     तब तक दोनो घर के करीब पहुंच चुके थे। माधव दौड़ा-दौड़ा गया अपने पट्टे को उड़ा दिया। जब तक सब रोकते उसने अपने जिम्मी नाम के प्यारेकुत्ते को भी मुक्त दिया।उसने सबकी डांट चुपचाप खुशी से सुन ली। अब माधव खुद को स्वतन्त्र महसूसकर रहा था। बन्धन मुक्त कर देने के बाद भी माधव के प्यारे पट्टूं औरजिम्मी रोज माधव से मिलने आते हैं।

  -वन्दना(साखिन,हरदोई)

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