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Friday, November 30, 2012

Poem by Mradul


नारी गाथा



नारी के दोनो नयनों से
अश्रुओं की धारा बहती है
तुम कान खोलकर सुनकर देखो
वे चीख चीख क्या कहती है
ना जाने इस दुनिया मे
मेरा कब होगा उत्थान।
कब मुझको यहां प्यार मिलेगा
और मिलेगा कब सम्मान।
सदियों से ही मिलते आए
मेरे पद-चिन्हों के निशान
किन्तु अभी तक दुनियां मे
नारी बन पाई महान।
बाहर की तो बात ही छोड़ो
घर मे भी होता अपमान।
जैसे उसका अस्तितिव ही हो
जैसे हो उसमे प्रान।
जिसने जीवन दान दिया
उसे मार करते अभिमान
जिसके बल पर जीवित हो
है नारी का ही बलिदान।
नारी का सहयोग मिला 
तब जाके देश बना बलवान।
कर्तव्य तुम्हारा बनता है
अब तुम समझो इसकी आन
प्रतिउपकार करो भले ही
पर कुछतो मानो एहसान
सबको ही सुख देती है
खुद सबके दुख लेलेती है।
तुम कान खोल सुन कर देखो...
                   - मृदुल भारद्वाज
                    टड़ियावां,हरदोई




Poem by Vandana Tiwari


रे मन



रे मन,बन जा तू कुशल किसान
युग-युग से जो भारत की शान
मानव जीवन है उर्वर खेत,
संस्कारों से सिंचित कर ले,
निज संस्कृति नैतिकता को,
प्रीति बड़ों की आशीषधुनों को,
बीज बना ले, फिर उपजेंगी
श्रेष्ठ सिद्धियां और विज्ञान
रे मन...
स्वनुसाशन की कवच बनाले
दुर्गुण के तूफानों से बचाले
स्वाभिमान की पौध लगाले
तब लहलाएगी हिन्द फसल
गूंजेगा जग निज गाऽन
रे मन...
ले लेगा दाता नर तन खेत
समय फिसलता ज्यों होरेत
कण-कण को पसीने से डुबोदे
हर क्षण से खुशियां उपजेंगी
श्रम धन है, प्रेम रत्न है...
अमूल्य यही है यदि जग में
पाया तू ने निश्छल मान
रे मन...