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Friday, April 26, 2013

'आज'

उद्येश्य बदल गया
भावों की पहरन,शब्द
का परिमाण बदल गया।
साहित्य,दर्पण समाज का
धुंधला हो गया
प्रतिद्वंदी तलवार का,कलम
लोकेष्णा का दास बन गया
बाढ है,तो बारिश भी है
आऽज...
भावेश का बहाव बदल गया
साहित्य का,
उद्येश्य बदल गया।
परिवेश बदल गया।।
परिवेश बदल गया
-विन्दु

Tuesday, April 23, 2013

'चिरानन्द'

उद्वगन चित्त
है पहचान
असिद्ध बुद्धि की।
आता कहां उफान
सिद्ध दाल में
बटलोई की।
स्वरूप में
स्थित होना ही
है स्वस्थ होना।
निज मान,अपमान
आनन्द की चाबी
औरों के हाथ
क्या देना।
चिरानन्द है
स्वयं में
बस है पहचानना।
-विन्दु

Sunday, April 14, 2013

क्या जीवन है/हाइकू


बालू का स्थल
जलाभास रश्मि से
तपती प्यास

प्रीति सुमन
नागफनी का बाग
व्यर्थ खोजना

तृप्ति कामना
घी दहकाए ज्वाला
पूर्ति आहुति

जीन यात्रा
हर क्षण रहस्य
रोना या गाना

गन्तव्य कहां!
लमकन जारी है
क्या जीवन है!
-विन्दु

Monday, April 8, 2013

'मुझे वचाना'


आ जाओ खेलो
शीतल छाला देंगे
मित्र बुलालो

थक जाओ ज्यों
आराम करो सब
पंखा नीये त्यों

पक्षी देखोगे
मेरे आंगन आओ
चूजे भी पाओ

छतरी खोई?
बारिश से बचना
आ जाओ नीचे

भूखे,प्यासे हो?
फल खाओ या चूसो
घर लौटो जब

क्यूं पहचाना?
पेड़ मुझे कहते
मुझे बचाना
-विन्दु
(बाल साहित्य)

Tuesday, April 2, 2013

'अंश हूं तुम्हारा'

जब जिन्दगी के किनारों की
हरियाली सूख गई हो
पक्षी मौन होकर
अपने नीड़ों मे जा छुपे हों
सूरज पर ग्रहण की छाया
गहराती ही जा रही हो
मित्र स्वजन कंटीली राहमें
अकेले छोड़कर चल दिये हों
संसार की सारी नाखुशी
मेरे ललाट को ढक रही हो
तब मेरे प्रभु!
मेरे होठों पर हंसी की
उजली रेखा बनाए रखना
अंश हूं तुम्हारा,
कायरता को न सौंप देना।
-विन्दु