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Friday, December 13, 2013

'मैं' को ध्येय बनाउँगी

कल्पना के मुक्त पर से
सीमाओं तक जाऊँगी।
दुश्वारियों से परे, निज
अस्तित्व को मैं पाऊँगी।।

पर हीन पंछी के हृदय
वेदना ने गान गाये ।
बह न पाए अश्क जो भी
वो शब्द सुर ही बन गये।

नभ सिन्धु तक सैर करके
रश्मि मोद चुन लाऊँगी।।

दुनिया के वीराने पथ
दृष्टि नही टिकती जिनपर।
संगीत सजाएंगे,उन
राहों से आहें लेकर।

खुश होंगे वो पत्थर दिल
गीत वही जब गाऊंगी।।

'मम'में'पर-दर्द'जोड़कर
ऋण-ऋण धन बन जाएंगे।
तुष्ट  बनेंगे हम दोनों
भोगी भी सुख पाएंगे।

एक दिन सुख-राशि बनकर
मिल 'अनन्त' में जाउंगी।।

'मैं'नही व्यष्टि का द्योतक
साहित्य बसा है इसमें।
'मैं' की दिशा सही हो तो
संसार सजेगा सच में।

हर मैं' उन्नत होने तक
'मैं' को ध्येय बनाऊँगी।।

-विन्दु
(मौलिक/अप्रकाशित)

Thursday, December 12, 2013

साहित्य की पहुँच कहाँ तक??

        आज का समय अनेक विसंगतियों से जूझ रहा है। पूंजीवीदी विकास की अवधारण औरवैश्वीकरण नें समाज में गहरी खांइयां डाल दी हैं। सदियों से हमारे देश कीपहचान रहे गाँव,किसान हमारी अद्वितीय संस्कृति पर संकट के घनघोर बादलमंडरा रहे हैं। पूरी अर्थव्यवस्था एवं न्यायव्यवस्थ भ्रष्टाचारकी भेंट चढ चुकी है। संस्कृति जिसके बूते हमारे राष्ट्र की पताका विश्वमें फहराया करती थी,आज... पाश्चात्य के अन्धेनुकरण की दौड़ में रौंदी जारही है। जब सभी मनोरंजन के साधन उबाऊ सिद्ध हो रहे है,ईमानदार,नि:सहाय और आमआदमी की सुनने वाला कोई नहीं रहा।         ऐसे अराजक और मूल्यहीन विकृत मंजर में दर-दर से ठुकराई दमन के हाशिएपर खड़ी आत्मा की अन्तिम शरणस्थली बचती है तो एकमात्र साहित्य! साहित्य का उद्गम अथवा साहित्य का अध्ययन। उद्गम के लिए साहित्य-धर्मिता धारित हर व्यक्ति तो होता नहीं ,तो बात टिक गई आकर अध्ययन पर।  आज की साहित्य  में ऐसी क्षमता है जो इस स्थिति में मानव-हृदय को सहलाने में सक्षम हो सके? ये एक यक्ष प्रश्न है।आज केसाहित्य में क्या ऐसे नि:सहाय पात्रों को स्थान मिलता है?क्या उन दमितआवाजों को उजागर कर सर सकता है जिनका सुनने वाला कोई नहीं? ऐसे कई प्रश्न रचनाशीलता के पल्ले में हैं।
    
मुंशी प्रेमचंद ने कहाहै-''साहित्य की गोद में उन्हें आश्रय मिलना चाहिए जो निराश्रय हैं,जो पतित हैं,जो अनादृत हैं।''         साहित्य का मूल उद्देश्य हमारी संवेदना को विकसित करना है। पीछे नजर डाल के देखें तो महादेवी,शरतचंद्र चटर्जी का साहित्य पद्दलित महिलाओं के बारे में सोचने को बाध्य करता है,मैक्सम गोर्की का मजदूरों के बारे में। प्रेमचन्द्र के पढें को किसानों की दशा से मन उद्वेलित होता है,टैगोर जी का साहित्य हमारा चित्त अध्यात्मिकता की ओर खींचता है। क्या आज का साहित्य की भूमिका कुछ ऐसी ही है?     इतिहास और हिंदी साहित्य साक्षी है कि जब-जब समाज में गिरावट,अर्थव्यवस्था में गिरावट,अनेकानेक संघर्ष उपजे हैं तब-तब उत्कृष्ट साहित्य सृजित हुआ है। आदिकाल,मध्यकाल हो या उपनैवेशिक काल,अनेक उदाहरण हमारे समक्ष हैं। इतिहास में कदाचित् पहली बार ऐसा हो रहा है जब साहित्य औरसमाज दोनो की अधोगति का एकाकार हो रहा है,दोनो में एक साथ गिरावट आ रहीहै। 

            आज जब साहित्य में संस्कृति,आम-आदमी की स्थिति और अवहेलि आवाज कोउजागर करने का समय है तब साहित्य महानगरीय और विलासिताओं के बोध से भरापड़ा है। मानो मनुष्य का विवेक और साहित्य-धर्मिता चंद समृद्ध शहरों तक ही सिमट कर रह गया हो। साहित्यकार विदेशों के चित्र,समृद्धियों के चित्र अपनी पहुंच प्रदर्शित करने के लिए प्रस्तुत करने लग गये हैं। आखिर कारण क्या है जो 100 वर्षों से अधिक हो गया है भारतीय साहित्यकार नोबेल पुरस्कार पर अधिकार नहीं कर सका।

         ऐसी बात नहीं कि आज उत्कृष्ट साहित्य-धर्मिता मृतप्राय हो गई है लेकिन कमी अवश्य आई है। वह कम परन्तु विशिष्ट रचना शीलता सत्ता-क्षेत्रों और चकाचौंध से दूर है और चुप-चाप अपनी आत्मा की संतुष्टि के लिए रचना कर्म कर रहे हैं। उसे प्रकाश में लाने वाले शायद कम ही हैं ,क्योंक जिसकी लाठी उसकी भैंस। स्वार्थ और स्वयं लोकप्रिय होने की अतिशय भूख अध्ययन,आंकलन और गुणवत्ता को निगल रही है।

          मुझे लगता है जो यत्र-तत्र कुछ संस्कृति,संवेदना और सज्जनता जीवित है वह इसी साहित्य की वजह से ही है,भेले ही ऐसा साहित्य पुरस्कार अधिकारी कभी न पाए।  ऐसे विलक्षण समय में साहित्य की बाहुल्यता,उत्तम शिल्प,खोखली लोकप्रियता से गदगद होने की बजाय पथ-प्रदर्शित करने वाले साहित्य को प्रकाश में लाने में सार्थकता है। कहा गया है-''एक सफल राजनीति अर्धशताब्दी में भी जन-कल्याण के लिए जो नहीं कर सकती वह उत्कृष्ट साहित्य की एक साधारण सी पंक्ति कर देतीहै।साहित्य के सृजन को कोई मिटा नहीं सकता।''  

      समाज में युवाओं के मनोरंजन के बहुतायत साधनउपलब्ध हैं,परन्तु मनोमंथन के लिए प्रेरित करने वाला एकमात्र उत्तमसाहित्य ही है।महान विद्वान आस्कर वाइल्डि ने कहा है-''Literature always anticipates life.It does not copy it or entertain it,but moulds it to its purpose''इसलिए साहित्य-धर्मिता विकसित करने से पहले मुझे लगता है,साहित्य की उत्कृष्टता और उद्देश्य की पहचान करने की नितान्त आवश्यकता है। सादर शुभेच्छावन्दना

Friday, November 22, 2013

आजादी

      माधव अपने चाचू के साथ चिड़ियाघर घूम रहा था।  बीच में ही चाचू सेघर चलने की जिद करने लगा।
चाचू ने कहा- ''बेटा इतनी दूर आए हैं,पूरा ज़ू देख तो लें। जानवरो कीगतिविधियां तो तुम्हे बहुत अच्छी लगती है। बड़ी उत्सुकता से देखा करतेथे,आज क्या हुआ तुम्हे?''

माधव ने तेवर तीखे करते हुए कहा-''चाचू मैं और आप इन कटघरों में बन्द होता तो?'

'चाचू- ''अरे बेटा! पशुओं से खुद की तुलना क्यों कर रहे हो?''
माधव-''चाचू,पशु बोल नहीं पाते तो क्या उनके हमारे तरह मन भी नहीं होता?उनका तो स्वभाव ही आजाद रहना होता है।''

उसके चाचू उसकी जिद पूरी करते हुए घर की ओर चल दिये।रास्ते में दोनो चुप थे। काफी देर बाद चुप्पी तोड़ते हुए माधव ने कहा-
''आपको याद है चाचू,सरकस में बेचारे पशु कैसे इशारे पर करतब दिखा रहेथे।''
चाचू-''हाँ बेटा यही मनुष्य की कला है जो जानवर को भी...''बीच मे ही काटते हुए माधव बोला-
''क्या कला,अबोध पशुओं की स्वतन्त्रता सेखिलवाड़ करें।पैसे कमाएं और हम लोग देख कर मस्ती करते रहें।''

इसबार उसके चाचा शान्त रहे।अभी दोनो घर पहुंचे नहीं थे कि अचानक एक मदारी दिख गया। उसके चाचा नेसोचा अब माधव पुरानी बात भूल गया होगा। अभी बच्चा ही तो है। यही सोच करचाचा ने कहा-
''माधव बंदरिया नाचते हुए देखोगे? वह देखो मदारी।"
माधव ने तपाक से उत्तर दिया-''चाचू अभी मेरे गले में जंजीर पड़ी होती,इसबंदरिया की तरह तब भी आप इतने ही खुश होते?''

     तब तक दोनो घर के करीब पहुंच चुके थे। माधव दौड़ा-दौड़ा गया अपने पट्टे को उड़ा दिया। जब तक सब रोकते उसने अपने जिम्मी नाम के प्यारेकुत्ते को भी मुक्त दिया।उसने सबकी डांट चुपचाप खुशी से सुन ली। अब माधव खुद को स्वतन्त्र महसूसकर रहा था। बन्धन मुक्त कर देने के बाद भी माधव के प्यारे पट्टूं औरजिम्मी रोज माधव से मिलने आते हैं।

  -वन्दना(साखिन,हरदोई)

Friday, September 27, 2013

बत्तख और भैंस/बाल कहानी

तालाब की लहराती लहरों में किलकारियां करती हुई भैंस को देख पास में तैरती बत्तख ने पूछा- ''बहन आज बहुत खुश लग रही हो,क्या बात है?''
भैंस-''सच्ची बहन,आज मैं बहुत खुश हूं।''
बत्तख-''अरे! क्या हुआ,मुझे भी बताओ।''
भैंस-' बहन,दो दिन पहले मैं कानपुर गई थी,जहां गंगा में नहाया,तब से मेरे रग-रग में जल की गंदगी और बदबू समाई हुई थी। आज सुन्दर हरियाली से घिरे इस छोटे से तालाब में नहाकर मानो मेरा मन तक धुल गया हो। सुहानी पुर्वइया...ऐसा लग रहा है जल नृत्य कर रहा हो।''
बत्तख ने कहा-अच्छी बात है बहन तुम्हे यह वातावरण अच्छा लग रहा है,लेकिन गंगा तो भारत की पवित्रतम् नदी है। इसके जल के आचमन से ही अपवित्रता धुल जाती है। और तुम गंगा की गंदगी इस छोटे से पोखर में धुलने की बात कर रही हो! गंगाजल कभी अपवित्र नहीं होता बहन।''
भैंस की पीठ पर बैठा बगुला बीच में बोल पड़ा-''जैसे आपकी धवलता...कभी कम नहीं होती,चाहे कीचड़युक्त पानी में तैरो या स्वच्छ जल में।''
बत्तख गर्व से मुस्कराई परन्तु भैंस ने कहा-''बगुले भाई, मैं काली हू, मुझे दोष भी पहले दिखते है,मनन करने की क्षमता मुझमें कहा! सतही तौर पर मुझे जो आभास हुआ सो बताया।''
बत्तख और बगुला दोनो यह सोचकर शांत हो कि गए गंगा जी के सम्पर्क में सभी विवेकशील ही तो नही आते हैं,जो इनकी अखण्ड पवित्रता को समझे। मानव अपने स्वार्थ के लिए स्वच्छता और शुद्धता को भी कुचल रहे हैं। इससे हम पशु भी त्रस्त हैं।



-वन्दना तिवारी

Saturday, September 21, 2013

गौरव या हीनता??

सादर वन्दे सुहृद मित्रों...
हिन्दी दिवस...हिन्दी पखवाड़ा...फिर धीरे धीरे जोश टांय टांय फिस्स!
शुभप्रभात,शुभरात्रि,शुभदिन सभी को good morning,good night & good day दबाने लगे।
आज बच्चों के लिए (क्योंकि बच्चे हिन्दी के शब्दों से परिचित नहीं या फिर उनका अंग्रेजी शब्दकोष बढाने के लिए) बेचारे बुजुर्गों और शुद्ध हिंदीभाषी लोगों को भी अंग्रेजी बोलने के लिए अपनी जिव्हा को अप्रत्याशित ढंग से तोड़ना मरोड़ना पड़ता ही है। उन्हें गांधी जी का वक्तव्य कौन स्मरण कराए जो कहा करते थे-
''मैं अंग्रेजी को प्यार करता हूं लेकिन अंग्रेजी यदि उसका स्थान हड़पना चाहती है,जिसकी वह हकदार नहीं है तो मैं सख्त नफरत करूंगा।''
अध्ययन का समय ही कहां है अब किसी के पास जो महापुरुषों के सुवचनों संज्ञान में आये। ईश्वर ही बचाए समाज को।
14सितम्बर 1949 को संविधान सभा मे एकमत होकर निर्णय लिया गया कि भारत की राजभाषा हिन्दी होगी। इसी महत्वपूर्ण निर्णय को प्रतिपादित करने तथा हिंदी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिए ''राष्ट्र-भाषा प्रचार समिति वर्धा'' के अनुरोध पर 1953 से समपूर्ण भारत में 14 सितम्बर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। राष्ट्रीय ध्वज,राष्ट्रीय पशु,पक्षी आदि की तरह राष्ट्रीय भाषा भी होनी चाहिए,लेकिन किताना दुखद है कि हम हिंदी को देश की प्रथम भाषा बनाने में सक्षम नहीं हो पाए हैं।
हिंदी भारत की प्रथम भाषा बने भी तो कैसे जब देश के प्रथम नागरिक तक आज हिंदी को नकार अंग्रेजी में सम्बोधन करते हैं,जहां के नागरिक हिंदी के माध्यम से शिक्षा दिलाने में हीनता का अनुभव करते हैं,रिक्शाचालक भी रिक्शे पर अंग्रेजी में लिखवाकर छाती चौड़ी करते हैं। ज्यादा क्या कहें हमारे संविधान में ही देश की पहचान एक विदेशी भाषा में है-India that is Bharat'. विचारणीय है जहां वैश्विक मंच पर सभी देश अपनी भाषा के आधार पर डंका बजा रहे हों और अकेले हम...विदेशी भाषा में सस्वयं का परिचित करा रहे हों,तो हमे गुलाम अथवा गूंगे देश का वासी ही कहा जाएगा। विद्वानों ने कहा है कि जिस देश की कोई भाषा नहीं है वह देश गूंगा है। ऐसा सुनकर,अपना सिक्का खोंटा समझ हमें सर ही झुका लेना पड़ेगा। आज चीन जैसे देश राष्ट्र भाषा का आधार लेकर विकास की दौड़ में अग्रसर हैं,और भारत में खुद ही अपनी भाषा को रौंदा जा रहा है। अंग्रेजी शिक्षितजन अपनी भाष,संस्कृति,परिवेश और परम्पराओं से कटते जा रहे हैं और ऐसा कर वे स्वयं को विशिष्ट समझ रहे हैं।
कैसी विडम्बना है आज हीनता ही गौरव का विषय बन गई है। ऐसी दशा में मुक्ति भला कैसे सम्भव है? आज अंधी दौड़ में हम भूल गये हैं कि स्वामी विवेकानन्द जी अंग्रेजी के प्रकाण्ड विद्वान होते हुए भी अपनी मात्रभाषा हिंदी के बूते शिकागो में विश्व को भारतीय संस्कृति के सामने नतनस्तक कर दिया। बहुत पहले नहीं 1999 में माननीय अटल बिहारी बाजपेई(तत्कालीन विदेश मंत्री) ने संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में सम्बोधित कर हमारे राष्ट्र को गौरान्वित किया था। अंग्रेजी के पक्षधर गाँधी जी के सामने अपनी जिव्हा दमित ही रखते थे। अंग्रेजी के बढते अधिपत्य और मातृ-भाषा की अवहेलना के विरुद्ध 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में आवाज उठाई गई थी। श्री केशवचन्द्र सेन, महर्षि दयानन्द सरस्वती,महात्मा गाँधी, राजर्षि पुरुषोत्तमदास,डा. राममनोहर लोहिया आदि देशभक्तों का एक स्वर मे कहना था-''हमें अंग्रेजी हुकूमत की तरह भारतीय संस्कृति को दबाने वाली अंग्रेजी भाषा को यहां से निकाल बाहर करना चाहिए।'' ये हिंदी सेवी महारथी जीवन के अन्तिम क्षणों तक हिंदी-अस्मिता के रक्षार्थ संघर्ष करते रहे।
दुरभाग्वश वे भी मैकाले के मानस पुत्रों के मकड़जाल से हिंदी को मुक्त नहीं करा सके और राजकाज के रूप में पटरानी अंग्रेजी ही बनी हुई है,जबकि भारती संविधान इसे सह-भाष का स्थान देता है।
मन्तव्य अंग्रेजी या किसी भाषा को आहत करने का नहीं हिंद-प्रेमियों बस हम भविष्य की आहट पहचानें, अंग्रेजी अथवा किसी भी विदेशी भाषा को जानें,सम्मान करें परन्तु उसे अपनी अस्मिता या विकास का पर्याय कतई न समझें। वास्तव में राष्ट्रभाषा की अवहेलना देश-प्रेम,संस्कृति और हमारी परम्पराओं से हमे प्रछिन्न करती है। अपनी मातृ-भाषा का प्रयोग हम गर्व से करें,हिंदी के लिए संघर्ष करने वाली मनीषियों की आत्माओं का आशीर्वाद हमारे साथ है।
जय हो!
सादर
-वन्दना

Thursday, September 5, 2013

शिक्षक के सम्मान मे गिरावट या वृद्धि??

स्वप्रज्ञा बुद्धि बलेन चैव,
सर्वेषु नृण्वीय विपुलम् गिरीय।
अज्ञान हंता,ज्ञान प्रदोय: त:
सर्वदोह गुरुवे नमामि।।

आज तकनीकी युग में कम्प्यूटर द्वारा शिक्षा क्षेत्र में एक नई क्रान्ति प्रज्ज्वलित हुई है,परन्तु नौनिहालों के मन में ज्ञान ज्योति प्रदीप्त करने के लिए शिक्षक का स्थान महत्वपूर्ण है। माता-पिता के पश्चात बालकों को सही दिशा देने व उनका सर्वांगीण विकास करने में शिक्षक प्रमुख भूमिका है। शिक्षक सामाजिक परिवेश की वह गरिमामयी मूर्ति है जो हम सभी में ज्ञान का प्रकाश फैलाकर नैतिकता व गतिशीलता को गति प्रदान करते हैं।
ऐसे देवस्वरूप व्यक्तित्व को शत्-शत् नमन!
वस्तुत: गुरु-शिष्य का सम्बन्ध सदैव प्रकाशमान रहता है,शिक्षार्थी के हृदय में अपने गुरु के प्रति प्रेम व सम्मान सदैव प्रवाहमान रहता है फिर भी शिक्षक-दिवस इस पवित्र सम्बन्ध को मांजने का दिवस है,जिंदगी की भागमभाग में धूमिल हुए रिशते को पुन: स्वच्छ एवं सौम्य बनाने का दिन है।
अतीत में गुरु-शिष्य सम्बन्ध बड़ा ही दिव्य हुआ करता था,गुरु का स्थान साक्षात् वृह्म स्वरूप था,गुरु के आदेश-निर्देश मन्त्र सदृश्य थे। डा. राधाकृष्णनन जी कहा करते थे कि मात्र जानकारी देना ही शिक्षा नहीं है अपितु शिक्षा द्वारा व्यक्ति के कौशल,बौद्धिक झुकाव और लोकतांत्रिक भावना का विकास करना महत्वपूर्ण है। करुणा,प्रेम,विनय और श्रेष्ठ परम्पराओं का विकास भी शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए।
अब प्रश्न उभरता है कि आज के बदलते परिवेश में उनका वक्तव्य कहां तक प्रासंगिक है? गुरु-शिष्य के सम्बन्ध मे कहां तक परिवर्तित हुआ है? अर्थयुग का प्रभाव इस रिश्ते पर पड़ा है अथवा नहीं?
प्रतिस्पर्धा के चलते इस बन्धन में कुछ कमजोरी अवश्य आयी है परन्तु इसका उत्तरदायी कहीं न कहीं शिक्षक भी है। शिक्षक विद्यालय ही नहीं पूरे समाज का आदर्श होता है,उसके नैतिक गुण,सुदृढ़ चरित्र से उत्तम समाज की आधारशिला निर्मित होती है। आज के अर्थ-बाहुल्य कलयुग में क्या कहा जाय!न शिक्षक को न अपने दायित्व की सुधि है न ही शिष्य को अपनी गरिमा की। यत्र-तत्र तो इस पवित्र सम्बन्ध की हत्या भी हो जाती है,परन्तु शिक्षक दिवस की औपचारिकताओं में कोई कमी नहीं।
ग्रामीण क्षेत्र के प्रथमिक विद्यालयों पर नजर डालें तो कईबार शिक्षा की विदीर्ण तस्वीर सामने आती है। विद्वान और योग्य शिक्षक भी अपने कर्तव्यों से गिरते जा रहे हैं। प्राय: 'यहां के बच्चे डी.एम.नहीं बन जाएंगे चाहे जितना सर पटक दें' जैसी उक्ति सुनने को मिल जाती है। वहां के छात्रों के शिक्षण स्तर की जो बात करें बड़ा ही दुखद है।
इस विलक्षण समय के चलते बुराइयों का कद अवश्य बढ़ा है लेकिन अच्छाइयां भी मृतप्राय नहीं हुई हैं। उतनी ही अच्छाई के बूते राष्ट्र को विश्वफलक पर विकास की राह में गतिशीलता प्राप्त है। इस अराजक समय में भी विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि अनैतिकता चाहे जितनी सीमाएं पार कर गई हो,अस्मिता कितनी भी विस्मृत हो रही हो परन्तु गुरु शिष्य का सम्बन्ध आज भी बहुत ही गरिमा मय और दिव्य है बशर्ते हम शिक्षकों की रगों में उच्च नैतिक गुण,दृढ चरित्र और निष्ठा का लहू प्रवाहित होता हो। किसी विद्वान ने व्यर्थ ही नहीं कहा है-

''चुकता है कर्तव्यों से ही,
निज सम्बन्धों का कर्जा।
जो जैसा कर्तव्य निभाता,
पाता वैसा दर्जा।।''
अत:शिक्षक दिवस वह अवसर है जब शिक्षक दृढसंकल्पित होकर अज्ञान तम को मिटाने का बीड़ा उठाएं और छात्र भी गुरुओं को केवल उपहार ही नहीं बल्क सम्मान से प्रतिष्ठित करें। पुन: हमें अस्तित्व प्रदान करने वाले गुरुओं और शिष्ट शिक्षकों की बार-बार वन्दना।
सादर
शुभ शुभ

Tuesday, August 27, 2013

हे कृष्ण!

जय श्री कृष्ण!
जन्माष्टमी के उपलक्ष में एक प्रयास निवेदित है,कृपया समीक्षा करें-

त्याग,प्रेम अवतार श्याम
प्रेम रीति तो सिखाइये।
बृज-गोपियों सा त्याग रस
कलिकाल में भी डालिये।।

लोक-हित छोड़ा मंजु बृज
समोद मथुरा को धाए।
बही अश्कों की धार,जब
मेघ भावना के छाए।

तुमको भी जीता जिसने
हमें नीति वह सिखाइये।।

ज्ञान में ही मग्न ऊधौ
प्रेम भाव थे न मानते।
पर भक्त के विकार कृष्ण
चुन-चुन सब हैं निकालते।

उद्धव सम परोक्ष ज्ञान
अब हम सबको दिलाइये।।

है प्राप्ति में सुसुप्त प्रेम
विरह में जाग जाता है।
प्रेमी,इस वियोग में तो
ठौर-ठौर दिख जाता है।

डाँट मारी गोपियो ने
मत ये योग सिखलाइये।।

यदि कण-कण समाया श्याम,
उन्हें गिनके बताइए।
हम एक से ही मर मिटीं
वाणी-बाण न चलाइये।

जो ज्ञान को भी मात दे
वो ही प्रीति सिखलाइये।।
बृज-गोपियों सा त्याग-रस...
-विन्दु

Saturday, August 17, 2013

*परिवर्तन*

परिवर्तन है सत्य सदा
अपनाना इसको सीखे।
इसमे ही है नव-जीवन
नूतन पथ बुनना सीखें।।

नूतनता खुशियों की जननी
उत्सव नित्य मनायें हम।
खुश रहकर कुसमय काटें,
समय से न कट जाएं हम।

जीवन-रंग सजाने को
नयन-अश्रु पीना सीखें।।

शोक,हर्ष,उत्थान-पतन
हमें तपा कुन्दन करते।
अगम सिन्धु की झंझा में
कर्म सदा नौका बनते।

निष्कामी आराधक बन
जग-वन्दन करना सीखें।।

प्राणि मात्र से प्रीति करें
प्रेम पात्र जो बनना है।
अब जग जा,ओ रे मन!
मग यदि सुगम बनाना है।

प्रीति सुमन की चाह अगर
जड़ सिंचित करना सीखें।।
परिवर्तन है..
-विन्दु
सादर

Thursday, July 18, 2013

'हो भान तो वह'

(बहर-2122 2122 2122)

लक्ष्य क्या जो खोजते हम दौड़ते हैं।
है कहाँ ये आज तक ना जानते हैं ।।

ढूंढ साधन,साधने को लक्ष्य सोंचा
ना सधा ये, सब स्व को ही रौंदते हैं।

जग छलावे में भटकते इस तरह हम
शांति के हित शांति खोते भासते हैं।

हो समर्पण पूर्ण या लब सीं लिए हों,
क्या शिलाए भी प्रेम को सीलते है ?

ना पहुंचू पर मुझे हो भान तो वह
तब बढेंगे, आज तो बस खोजते हैं।।
-विन्दु

Wednesday, May 29, 2013

काँपते उर

संवेदना के
शुष्क तरु सानिध्य में,
पुष्प प्रीति के,
ढूंढे जा रहे हैं आज।
पत्थरों को ईश मान;
मंदिरों में घट बंधा,
घट-जलधार के पास से,
पिपासाकुल खग
भगाए जा रहे हैं।
प्रसाधन-जनित
यज्ञशाला की अग्नि में,
आँच के भय से
सब आहुति घटा रहे हैं।
सुना है,देखा नहीं
भगवान औ भूत दोनों को
पर...ईशास्था से अभय
को नकार
भूत में विश्वास कर
उर काँपते हैं आज।
-विन्दु

Wednesday, May 8, 2013

युगदृष्टा गुरुदेव

कल (7 मई) गुरुदेव रबीन्द्र नाथ टैगोर का जन्मदिवस था और 2013 उन्हें नोबेल पुरस्कार प्राप्त होने का 100वां वर्ष है। मन में आया कि एक छोटा सा परिचय अपने ब्लाग में संग्रहीत करूं। क्योंकि मुझे लगता है कोई भी भारतीय पुस्तकालय,किसी भी भारतीय का अध्ययन गीतांजलि के बिना अपूर्ण है।
'गुरुदेव' की उपाधि से सुविख्यात,कवि,साहित्यकार,दार्शनिक,महान सन्त,भारतीय साहित्य में एकमात्र नोबेल पुरस्कार विजेता वन्दनीय रबीन्द्रनाथ टैगोर साहित्य के माध्यम से भारतीय संस्कृति में नई चेतना फूंकने वाले युगदृष्टा थे। सर्वविदित है कि गुरुदेव का जन्म ७मई,१८६१ में कोलकाता में हुआ था। बहुत महत्वपूर्ण है कि टैगोर की दो रचनाएं दो राष्ट्रगान बनीं-
जन गण मन-भारत
आमार सोनार बंगला-बंगलादेश
बचपन से ही उनकी साहित्यिक प्रतिभा के दर्शन जनमानस को होने लगा था। उनकी पहली लघुकथा,जो 8 वर्ष की अवस्था में लिखी गई थी,1877में प्रकाशित हुई,जब वे मात्र 16 वर्ष के थे। धीरे धीरे उनकी परिपक्वता के साथ उनके सृजन का जाल भी विश्व में फैलने लगा।
संसार की समस्त प्रतिभा,साहित्य,दर्शन और चित्रकला आदि का आहरण कर मानो उन्होनें अपने अन्दर समाहित कर लिया था। पिता के ब्रह्म समाजी होने के कारण वह ब्रह्मसमाजी तो थे पर अपने रचना कर्म से उन्होनें सनातन धर्म को भी खूब सींचा।
ईश्वर और मनुष्य का साश्वत उनकी रचनाओं में अनेकानेक तरह से प्रतिबिम्बित होता है।
साहित्य की शायद ही कोई विधा गुरुदेव की रचनाओं मे शामिल न हो,कविता,गान,कथा,उपन्यास,नाटक,शिल्परचना सबकुछ लेखनी से तराशा। प्रमुख रचनाएं-
गीतांजलि,गीताली,गीतमाल्य,गोरा,साधना,शिशुभोलानाथ आदि आदि अनेक हैं।
प्रकृति के सानिध्य में रहने के शौक ने शान्तिनिकेतन की स्थापना की। फिर शान्तिनिकेतन को दृढता प्रदान करने के लिए टैगोर ने देशभर में नाटकों का मंचन कर धन संग्रहीत किया। गुरुदेव द्वार रचित 2230 गीतों का परिणाम रवीन्द्र संगीत है। अलग-अलग रागों मे प्रस्तुत उनके गीत आभास कराते हैं मानों गीतों की रचना राग के लिए ही की गई हो।
दर्शन की बात करें तो टैगोर ने अपने दर्शन में मानवता को सर्वोच्च स्थान दिया और राष्ट्रवाद को दूसरे पावदान पर रखा। विलक्षण बात है कि जीवन के अन्तिम दिनों में,जब कला के प्रति रुझान सुस्त होने लगता है,तब गुरुदेव ने चित्रकारी में पदार्पण किया और महारत हासिल की।
1910में लिखी 'गीतांजलि' का अंग्रेजी अनुवाद महान ब्रिटिश कवि w.b.yeats के पास 1912 में पहुंचा,और यीट्स ने पुस्तक का संक्षिप्त परिचय लिखा। अगले साल ही करिश्मा हो गया जब गीतांजलि को नोबेल पुरस्कार विजेता घोषित किया गया।टैगोर के साथ ही भारत का साहित्यिक ध्वज विश्वाकाश में लहलहा उठा। पुस्तक अदद प्रेम,दर्शन,प्रकृति और अध्यात्म का एक मिला जुला सा अनुभव है। एक ओर प्रेम की तलाश में डोलती एक करुण पुकार है तो दूसरी ओर मानवीय गरिमा,जिजीविषा और उत्थान का निर्भीक और स्पष्ट आह्वाहन है।कुछ गीत जिनने मेरे हृदयपटल पर गहरी छाप छोड़ी-
SONG-18
''Clouds heap upon clouds and it darkens.
Ah,love,why dost thou let me wait outside at the door all alone?
In the busy moments of yje noontide work I am with the crowd,but on yhis dark lonely day it is only for thee that i hope.
If thou showest me not thy face,if thou leavest me wholly aside,know not how I am to pass these long rainy hours.
I keep gazing on the far-away gloom of the sky,and my heart wanders wailing with the restless wind.''
हिन्‍दी गीतांजलि: गीत 44 : जगते आनंद-यज्ञे आमार निमंत्रण: जगत के आनंद-यज्ञ में मिला निमंत्रण। धन्य हुआ, धन्य हुआ, मेरा मानव-जीवन। रूपनगर में नयन मेरे घूम-घूमकर साध मिटाते, कान मेरे गहन सुर...
SONG-49
You came down from your throwne and stood at my cottage door.
I was singinf all alone in a corner,and the melody caught your ear.
You came down and stood at my cottage door.
Masters are many in your hall,and songs arre there at all hours. But the simple carle of this novice struck at your love. One plaimtive little strain mingled with the great music of the world,and with a flower for a prize You came down...
हिन्‍दी गीतांजलि: गीत 58 : जीवन जखन शुकाये जाय: जीवन जब लगे सूखने करुणा-धारा बनकर आओ। सकल माधुर्य लगे छिपने, गीत-सुधा-रस बरसाओ। कर्म जब लेकर प्रबल आकार गरजकर ढक ले चार दिशाऍं हृदय-प्रांत ...
हिन्‍दी गीतांजलि: गीत 66: वहन कर सकूँ प्रेम तुम्‍हारा ऐसी सामर्थ्‍य नहीं। इसीलिए इस संसार में मेरे-तुम्‍हारे बीच कृपाकर तुमने रखे नाथ अनेक व्‍यवधान- दुख-सुख के अनेक ...
हिन्‍दी गीतांजलि: गीत 67: हे सुंदर, तुम आए थे प्रात: आज लेकर हाथों में अरुणवर्णी पारिजात। सोई थी नगरी, पथिक नहीं थे पथ पर, चले गए अकेले, अपने सोने के रथ पर- ठिठक कर ...
SONG-90
On the day when death will knock at thy door what wilt thou offer to him?
Oh! I will set before my guest the full vessel of my lige-I will never let him go with empty hands.
All the sweet vintage of all my autumn days and summer nights,all the earnings and gleanings of my busy life will I place before him at the close of my days when death will knock at my door.''
1913 से 100वर्ष हो गए,भारतीय साहित्य के नाम दूसरा नोबेल पुरस्कारआज भी प्रतीक्षित है। भारतीय मूल के विजोताओं से ही संतोष करना पड़ रहा है।
भारत की इस महान विभूति को शत्-शत् नमन्।
-वन्दना
सादर

Friday, April 26, 2013

'आज'

उद्येश्य बदल गया
भावों की पहरन,शब्द
का परिमाण बदल गया।
साहित्य,दर्पण समाज का
धुंधला हो गया
प्रतिद्वंदी तलवार का,कलम
लोकेष्णा का दास बन गया
बाढ है,तो बारिश भी है
आऽज...
भावेश का बहाव बदल गया
साहित्य का,
उद्येश्य बदल गया।
परिवेश बदल गया।।
परिवेश बदल गया
-विन्दु

Tuesday, April 23, 2013

'चिरानन्द'

उद्वगन चित्त
है पहचान
असिद्ध बुद्धि की।
आता कहां उफान
सिद्ध दाल में
बटलोई की।
स्वरूप में
स्थित होना ही
है स्वस्थ होना।
निज मान,अपमान
आनन्द की चाबी
औरों के हाथ
क्या देना।
चिरानन्द है
स्वयं में
बस है पहचानना।
-विन्दु

Sunday, April 14, 2013

क्या जीवन है/हाइकू


बालू का स्थल
जलाभास रश्मि से
तपती प्यास

प्रीति सुमन
नागफनी का बाग
व्यर्थ खोजना

तृप्ति कामना
घी दहकाए ज्वाला
पूर्ति आहुति

जीन यात्रा
हर क्षण रहस्य
रोना या गाना

गन्तव्य कहां!
लमकन जारी है
क्या जीवन है!
-विन्दु

Monday, April 8, 2013

'मुझे वचाना'


आ जाओ खेलो
शीतल छाला देंगे
मित्र बुलालो

थक जाओ ज्यों
आराम करो सब
पंखा नीये त्यों

पक्षी देखोगे
मेरे आंगन आओ
चूजे भी पाओ

छतरी खोई?
बारिश से बचना
आ जाओ नीचे

भूखे,प्यासे हो?
फल खाओ या चूसो
घर लौटो जब

क्यूं पहचाना?
पेड़ मुझे कहते
मुझे बचाना
-विन्दु
(बाल साहित्य)

Tuesday, April 2, 2013

'अंश हूं तुम्हारा'

जब जिन्दगी के किनारों की
हरियाली सूख गई हो
पक्षी मौन होकर
अपने नीड़ों मे जा छुपे हों
सूरज पर ग्रहण की छाया
गहराती ही जा रही हो
मित्र स्वजन कंटीली राहमें
अकेले छोड़कर चल दिये हों
संसार की सारी नाखुशी
मेरे ललाट को ढक रही हो
तब मेरे प्रभु!
मेरे होठों पर हंसी की
उजली रेखा बनाए रखना
अंश हूं तुम्हारा,
कायरता को न सौंप देना।
-विन्दु

Friday, March 22, 2013

'मृत्यु प्रिया'/हाइकू

नश्वर जग
तुम नित्य सदा से
मैंने ये पाया
------------
तुम निष्पक्ष
आज अराजक है
ये जग जब
------------
दयावान तू
उबे,थके,दुखी के
कर गहती
------------
छिद्र बहुत
जग ने कर डाले
गले लगा ले
-------------
नौका पाई थी
भव से तरने को
इसे नसाया
-------------
ये रिश्ते नाते
हैं लक्ष्य मे बाधक
तू मिलवा दे
------------
तुझे दुलारूं
मृत्यु प्रिया जाने क्यूं
सब डरते
-विन्दु

Wednesday, March 13, 2013

सुखद छांव

मैं श्रमित
जिन्दगी की जद्दोजहद से व्यथित
चली जा रही थी
अज्ञात गन्तव्य की ओर
प्रेममय संवाद सुनकर रुकी
सघन छांव ने दिया ठौर
मतवाली लतिका
तरु के उर पर करती बिहार
गद गद था तरु
जो लतिका बनी गले का हार
तूफां हो या भानु-ताप
थामे थे इक-दूजे का हाथ
मैं 'भाग्यवान ज्यादा',था विवाद का मसला
सुनकर हृदय मेरा मचला और बोला-
मैं धन्य तुम दोनों से कहीं अधिक हूं
शीतल छांव का भाजक एक पथिक हूं
त्याग समर्पण प्रीति के प्राण हैं
चैन बंटता है जिसकी सुखद छांव में
प्रेम ही तो जगत का सृजनहार है।
-विन्दु

Tuesday, February 26, 2013

'भावों का आकार'

उर के आंगन मे बिखरी है भावों की कच्ची मिट्टी
मेधा की चलनी तो है,हिगराने को कंकरीली मिट्टी
रे मन!
बन जा कुम्भज
संयम नैतिकता के कुशल हस्त से,
दे डालो भावों को
सुन्दर बासन का आकार।
सिंचित करना निज हृदय-वाटिका,
खूब उलीचना और संजोना,
गागर भर-भर मुस्कान लुटाना,
लेना हर दृग से बहने से पहले आंसू,इनमें।
-विन्दु

Thursday, February 21, 2013

'माँ'

माँ..
मैं परिणाम तुम्हारे त्यागों का
वरदान तेरे संघर्षों का
सम्मान तुम्हारे भावों का
निष्कर्ष तेरे कर्तव्यों का
कोरी है रसना की परिपाटी,
क्या शब्द बुनूं तेरी ममता में...
तेरे,
संघर्षों से अस्तित्व मिला
तेरे भावों से उर प्रेम खिला
कर्तव्यों से पथ-दर्श मिला
कुछ यूं हि मुझे आकार मिला,
क्या प्रतिफल दूं तेरी ममता में...
तूने,
सृजन किया है दृढ़ता से
पर पाला अति कोमलता से
मोह त्यागकर ममता से
खुद जल,सींचा शीतलता से
बंजर है मेरा हृदय क्षेत्र,
क्या भाव गढ़ूं तेरी ममता मे...
सम्भव है, पृथक रहूं मैं तन से
दायित्व बंधें हैं जो जीवन से
संस्कार पौध रोपी जो तूने
प्रसून बिखेरेगी जग-उपवन में
प्रीति-मेघ की बौछारों के
दो 'विन्दु' समर्पित तेरी ममता में...
-विन्दु

Wednesday, February 13, 2013

'क्यों'

दफ़नाए है ग़म अन्त: में
अश्कों के मोती बिखराएं क्यो?
महफ़ूज खुशी है दुनियां मे
बुलबुले पकड़ने दौड़ें क्यों?
हमें मांजने आती जो,उस
रजनी की कालिख से क्या झुंझलाना
असल कालिमा होती गर,
नवल प्रभात गले लगाता क्यों?
प्यास तपाता मधुमासों हित
उस पतझर से क्या अकुताना
तुष्टि सिला है उसी तपन का
तो मधुबन का जाना वीराना क्यों?
-विन्दु

Friday, February 8, 2013

...मनोदशा

....धीरे-धीरे विद्यालय बन्द करने का भी समय हो चला था तबतक उसे याद आया कल बच्चियों ने कहा था-माँ स्कूल मे प्रोग्राम है आपको जरूर चलना है,सबके तो पापा आएंगे' माँ भी द्रवित होकर जाने के लिए कह रही थी,सो अगले दिन की एप्लीकेशन लिख के रख दी।
स्कूल पहुंचते ही बेटियों ने माँ का अपने सर से परिचय कराया-''सर मेरे पापा नहीं,मेरी माँ आईं हैं'
'अच्छी बात है बेटे. अरे ये तो मेरे साथ पढ़ती थी,वर्तिका है' आश्चर्य के साथ कहा।
'मुझे पहचाना वर्तिका मैं...'
'जी हाँ बिल्कुल संजीव' हंसकर कहा।
तुम तो हमेशा अव्वल रहती थी पढ़ाई में,अच्छी जगह पर होगी इस समय-संजीव ने आग्रहपूर्वक कहा
'हाँ,इस समय मै अपने पति की जगह जाब कर रही हूं' कुछ कतराते हुए जवाब दिया।
संजीव-'मतलब! अब वो दुनिया मे नहीं हैं,और तुम पहले से नौकरी नही?'
'नहीं,जल्दी शादी होने के कारण आगे पढ नहीं हो पाई,सूरज ने कहा भी पढ़ाई कर लो पर मुझे लगा सूरज के रूप में मुझे परम लक्ष्य मिल गया है।खैर... मैं उनके अन्तिम उपहार के साथ खुश हूं,गाँव का शुद्ध परिवेश और निश्छल बच्चों का साथ मुझे बहुत लुभाता है।'
आँख की कोरें नम होती देख संजीव ने बात बदली-तुम लिखती भी तो अच्छा थीं,आज के प्रोग्राम का समापन आपकी कविता के साथ होगा।
'नहीं नही अब मैं नहीं..'
पर उसकी बात न सुनते हुए संजीव ने एंकर से जा बताया।
बार्तालाप को आगे बढ़ाते हुए-'शालिनी आपकी पड़ोसन है न!बता रही थी आपकी सासू माँ का स्वभाव...''
तुरन्त तेवर बदल गये और बीच में ही बोल पड़ी-'क्षमा चाहूंगी मि.संजीव,कईबार नारी के जीवन मे आई विषमता उसे कर्कशा कुलटा न जाने क्या बना देती हैं.दुसरी बात उसमे अनीति या गलत देखने की क्षमता कमतर् होती है साथ ही कभ-कभी,भविष्य में कुछ गलत न हो जाए इससे भी सहम जाती है वस्तुत: यही उनकी कठोर वाणी का कारण बनता है,
बिना उसकी मनोदशा समझे कुछ भी कहना कैसे...
तबतक एंकर ने पुकारा और साथ वर्तिका के सिविल मे टाप करने की सूचना भी दी(जो शायद उसे भी अभी नही मालूम थी)-
वर्तिका ने कविता में मानो खुद को ही प्रस्तुत कर दिया हो-
इक दीप प्रदीप्त हुआ
उजियारे में
मात्र प्रेम की प्यास
और ढेर से प्रकाश की आभा
संजोए हुए
कभी आरती मे सजी
कभी कब्र पे चढ़ी
शाम हुई कुछ रोशनी उभारी
फिर रात के तम् से लड़ती रही
सुहानी प्रभात की आस
लगाए हुए
सुबह हुई
सूरज में अस्तित्व ही
विलीन कर दिया
अनजान थी के
रात भी आएगी
घटाओं की धुंध भी छाएगी
पर आस्था से अनजाने
वर्तिका दृढता पा रही थी
अनवरत् जलने के लिए
विषमताओं से लड़ने के लिए
धुंध मे रोशनी दिखाने के लिए
(गहरी सांस लेते हुए)
सूरज ढल गया
वर्तिका रोशन रही...
बस आवाज पूर्णत: अवरुद्ध हो गई।
-विन्दु

Tuesday, February 5, 2013

मनोदशा

''महिला ही जब महिला का तिरस्कार करे तो पुरुषों का क्या...''सुनकर वर्तिका थोड़ा ठिठुकी और अपने रास्ते पर चल पड़ी.
ऐसे कटाक्ष सुनने की वह आदीहो गई.
घर में सासू मां के कठोर शब्द तो उसने पति के न रहने के बाद आत्मसात ही कर लिए थे,हृदय पटल पर मलिनता की छाईं भी न पड़ती थी. यदि वह उनका भी बुरा मानती तो दुनिया मे और कोई था भी तो नही उसका अपना. बच्चियां दोनो अभी छोटी ही थी. इसीलिए वह स्वयं को स्तम्भ मानते हुए बड़ी सौम्यता से दायित्वों का निर्वहन करती जा रही थी. कभी-कभी वह समाज की भर्त्सना,कटाक्ष,विभाग की विषमताओं,बच्चों की कुण्ठा मां की वेदना और पारिवारिक चिन्ताओं से अकुता भी जाती थी. सोंचती-''हे प्रभु,क्या एक पुरुष ही नारी के जीवन का आलम्ब होता है,वही महिला के जीवन की ढाल होता है,खुशियों का आधार...सर्वस्व वही होता है...उसके बिना नारी का कोई अस्तित्व ही नही होता?'' अगले ही क्षण बच्चों का मोह सबकुछ विस्मृत कर देता है और पुन: पूर्वस्थिति में ही जकड़ लेता है.
उसके हृदय में अनेक तरह के विचारों का ज्वार-भाटा उठा ही करता था,कभी सकारात्मक हिलोरें तो कभी नकारात्मक,कभी विद्यालय जाते वक्त रास्ते मे तो कभी घर में रसोई बनाते समय. न कोई सुनने वाला न कोई सुनाने वाला. स्व सुनता और स्वयं सुनाती. एकबार वर्तिका के अन्त:करण मे प्रश्न गूंजा कि जब एक पति ही स्त्री का आलम्ब है तो क्यों नही चु लेती दूसरा पति? बेटियों को भी पिता मिल जाएगा,मां तो वृद्ध हो चली हैं,सेवा कर लूंगी...जवाब मे पता नही किस झिझकोर ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी-क्या सूरज की जगह उसे(अगले पति) दे पाओगी? यदि दे भी पाओगी तो उसे भुला पाओगी? भूलने की कोशिश भी की तो क्या सूरज का नाम ही मिटा दोगी?यदि हां तो मां सही तो कहती हैं 'कुलघातिनी'. यदि नहीं तो अगला पति स्वीकार करेगा कि तुम सूरज की काल्पनिक तस्वीर भी अपने हृदय से लगाओ! नही ना! तो जिन खुशियों के पीछे दौड़ रही हो उन्हे प्राप्त कर सकोगी??? इस तरह के अगणित प्रश्नों की धुंध से निकलने का रास्ता बस एक एक ही शब्द मे समाया हुआ था- ''नही,कदापि नहीं''
सूरज मेरा प्रेम है और रहेगा...साश्वत. अभी तो मां कहती हैं कुलघातिनी तब तो मैं सिद्ध कर दूंगी.अभी मेरी बेटियां स्व. कर्तव्यनिष्ठ की बेटियां हैं तब तो मेरी ही बच्चियां किसी अन्य की पत्नी होने के नाते मुझसे ही झिझकेंगी. इसलिए नही..नही..नही..बस. मेरे बच्चों के लिए,कुल की अस्मिता के लिए,नारी जाति के लिए...मेरे प्रेम के लिए.
इतने सघन द्वन्द के बाद उसका दिमाग बिल्कुल शून्य हो गया था,निर्जन.
कब नींद आई कब सबेरा हो गया,पता ही नही चला। सुबह होते ही फिर सबकुछ कल जैसा ही था,वही दायित्व,वही कार्य करने की ललक.
माँ को प्रणाम किया,बेटियों के साथ-साथ खुद भी तैयार होकर विद्यालय के लिए चल दी. (''माँ समय से खाना खा लेना,अपना ख्याल रखना,करना कुछ भी नहीं मैं आके सब कर लूंगी...'' आदि वक्तव्य जाने से पहले कहना मानों उसकी आदत में शामिल हो)
गाँव मे प्रवेश करते ही प्रकृति का सुखद संसर्ग सारी व्यथाओं का पान करता जा रहा था. ओस से नहाया शीतल वातावरण,सनसनाती शान्ति मे कोयल और मोर की मोहक आवाजें...
दोनो ओर से झुकी हुई लम्बी-लम्बी नम पतवार के माध्यम से प्रकृति ने पूर्णत: आलिंगित कर लिया था. 'आह!अन्त:करण निर्मल हो गया, हे ईश्वर!ये अलौकिक उपहार,निराली छटा गाँवों से कभी मत छीनना,सद्बुद्धि बनाए रखना यहाँ के लोगों की,शहरों ने तो सब निगल ही लिया है।' आदि मन ही मन सोंचती हुई गाँव पहुंच गई। किसी की आवाज कान मे पड़ी- 'विद्यालय मे अनुपस्थित मिलने के कारण शिक्षिका निलम्बित' पर अनसुना कर दिया 'मैं रोज विद्यालय आती हूं' सोंचकर. विद्यालय में उपस्थितु दर्ज करने को ज्यों
रजिस्टर खोला,मोटा मोटा लिखा था 'अनुपस्थित,स्पष्टीकरण दें अन्यथा निलम्बन'
तब उसे ध्यान आया कल माँ की तबियत कुछ खराब थी सो जल्दी चली गई थी और शायद हस्ताक्षर करना भी भूल गई थी पर बच्चों ने तो बताया ही होगा मैं आई थी. बच्चों से जवाब मिला-'हमसे कुछ पुछिन नाइ तबका'।वर्तिका-'कितनी देर रुके थे वो लोग,पढ़ाई-लिखाई के बारे में जो पूछा होगा सब बता दिया होगा तुम लोगो ने? एक बच्चा बोला 'दीदी जी कुछ नाइ पूछिन,आप मसाला छुअइ तक का मना करती हअउ,उनने हमहे से मंगाई थी।'
वर्तिका के अन्तर,जो एक वास्तविक शिक्षक बनना चाहता है,झुंझला उठा और वह स्टाफ के साथ जा बैठी। तब उसे पता चला 1000 रु.भिजवा दे सब ठीक हो जाएगा. उसने सोंचा,पति के साथ-साथ सारी खुशियां छिन गई,तब मेरा कुछ नही हुआ अब कौन क्या कर लेगा एक पैसा नहीं दूंगी,ना ही विद्यालय छोड़ के किसी की हें हें करने जाउंगी,नौकरी लेने की हिम्मत रखता है कोई तो लेले,काटले मेरा वेतन,कर्तव्यनिष्ठा की जड़ें गहराई तक होती हैं,कोई न देखे ईश्वर देखता है'
उठी,बच्चों को पढ़ाने/खेलाने में मशगूल हो गई। 2:30बजा ही था आज फिर स्टाफ जाने लगा,किसी ने कटाक्ष छोड़ा-''चलो दीदी,आज का समय गाँधी बनने का नही है,उसदिन आपके छूटे दसखत ईश्वर कर नही गये थे''
मूक ही रही,मानो मौन ने कटाक्ष के गाल पर तमाचा जड़ दिया हो.तब तक एक और अध्यापक महोदय-न हो यहीं घर बनवा लो वर्तिका वैसै भी तुम्हारी सास..'' वीच मे ही ''आगे मत बोलना श्रीमान!आप क्या जैसे क्या समझेगे हम महिलाओं की मनोदशा,बहुत बार वो बोलती कड़ुआ है,लेकिन हित छुपा रहता है। मेरी माँ..जिसने सिर्फ यही सुना,जाना ऐर माना हो कि बेटा के अग्निदान, श्राद्ध,पिण्डदान के व्यक्ति सर्वदा नरकगामी होता है,इतना ही नही वह तो कहती हैं कि ऐसे व्यक्ति का कई जन्मों तक उद्धार नही होता है,उसे चिड़चिड़ाहट और कटु शब्दों के सिवा कुछ सूझेगा! और यदि वह कटु न बोलतीं तो आप महानुभावों की सहानुभूति कैसे मिलती!उन्हें शायद यह नहीं पता कि आप जैसे सुपुत्रों की माँ हास्पिटल मे सड़ है और बेटा मटर-गश्ती करता हुआ घूम रहा है,अपने कर्तव्य तक का बोध नहीं है जिसे!
पर माँ की ममता तो अतुल्य...'
मानो सारी चुप्पयों का गुबार उड़ेल दिया हो यहा पर.इतना सुन महोदय ने अपनी राह ली और...

Friday, February 1, 2013

'कौन'

क्या चित्र है!
चित्रकार का अहसास हो रहा है
कौन है?
जो कण-कण,कला की आभा बिखेर रहा है

सहमी रही
सिमटी रही
जिस कुहासी धुंध से
ज्यूं चीरने लमकी...
धुंध में ही शीतानन्द लुट रहा है

किसका पसीना?
ओस बन मन को लुभा रहा है

अकुता रहा था दिल
दुनियां की दुश्वारियों में
नज़दीक आई यूं लगा,
कुदरत-ए-आगोश सहलाने बुला रहा है

कौन ?
अनगढ़े भावों को पढ़ रहा है

नादां थी नजरें...
नजारों से ओझल रहीं
कलरवी संगीत
मंजु परिवेश से अंजां रहीं
उर से लखा,हर परिंदा
मोहब्बत-ए-राग गा रहा है

चिलमन की ओट से कौन?
जादू चला रहा है।

-विन्दु

Saturday, January 26, 2013

आस्था की प्यास

अदाकारों के संग 
जिन्दगी चलती चली गई।
आस्था की प्यास 
और तपती चली गई।

 जीवन्त अभिनय था 
मन अभिभूत हो गया।
करुणा में गोते खाते 
अनुराग हो गया।
थी रोशनी की आस,
रोशनाई का साथ हो गया।

मणि की चाह...
कौंध काँच की छलती चली गई
आस्था की प्यास 
और तपती चली गई।

चिन्ता चिता में 
चिन्तन आहूत हो गया।
अंकुरण तो हुआ,
पर बीज गल गया।

तमतमा के तम से 
अतल में ज्वार आ गया।
क्रान्ति उमड़ी
कभी नयनों से झर गया!

 धवल कान्ति प्रेम की,
बिन्दु मे ढ़ूंढती चली गई...
अदाकारों का संग 
जिन्दगी देती चली गई।
                 -विन्दु

Thursday, January 24, 2013

गाँवों का खोखला उत्थान

विश्वपटल पर हमारे देश की पहचान एक कृषि प्रधान देश के रूप मे है. गाँवों को भारत के पैर कहा जाता है. हम गाँवों के बहुआयामी उत्थान के लिए अग्रसर भी हैं चाहे वह सड़कों,नहरों,शिक्षा,स्वास्थ्य कोई भी क्षेत्र हो। प्रगति के आंकड़े वन्दनीय ऊंचाईयों को छू रहै हैं,लेकिन कई बार गाँव के दावे पर आंकड़े खोखले सिद्ध हो जाते हैं. वैश्विक फलक पर देश के पैरों का ढिंढोरा तो खूब पिटता है परन्तु पैरों का लकवा और पोलियो किसी के संज्ञान मे नही है, परिणाम लड़खड़ाती गति हमारे समक्ष है. सुश्री मायावती के कार्यकाल में दलितों का आत्मविश्वास भले बढ़ा हो, राजधानी लखनऊ मे चमचमाती सड़कों और सिसज्जित बाग-बगीचों से चमक भले आ गई हो परन्तु भ्रष्टाचार और अफसरों की मनमानी से गाँवों की हालत और खस्ता होती चली गयी। पिछली पंचवर्षी योजना मे 80,000 करोड़ से ज्यादा धनराशि का आनंटन ग्रामीण विकास के लिए किया गया था,लेकिन सड़क नेटवर्क,रोजगार,जल,विद्युत आपूर्ति मे अभी भी सैकड़ों गाँव की हालत बदतर है।राहुल गाँधी ग्रामीण युवाओं को आकर्षित जरूर कर रहें हैं पर उन्हे विकास ऐर रचनात्मकता से जोड़ने का कोई सार्थक प्रयास नही दिखा।ग्रामीणों के साथ खटिया पर बैठ उनका कुछ प्यार तो पा ही लिया है। प्राथमिक शिक्षा,देश की भावी रीढ़,जर्जर होती जा रही है। प्रलोभनों की तो भरमार है लेकिन हाथ लगती है तो घटिया मिडडे मील के साथत अधकचरी शिक्षा। 'प्रथम'(प्राथमिक शिक्षा पर काम करने बाली संस्था) के नवीनतम् आंकड़ों के अनुसार लगभग 56% बच्चे कक्षा 1 के स्तर का पाठ नहीं पढ़ पाते हैं।जहाँ वर्ष 2010 में कक्षा 5 के लगभग 71%बच्चे दो अकों का जोड़-घटाना कर लेते थे वहीं 2012 में यह प्रतिशत घटकर 53 पर पहुंच गया है। विद्यालयों में औपचारिकताएं सभी दुरुस्त हैं क्योंकि उनका लेखा-जोखा देना है,शिक्षा का स्तर कौन देखने आयेगा,इसलिए समय बचा तो पढ़ा दिया अन्यथा अभिलेखील काम में ढील करके वेतन के सा रिस्क कौन लेगा । वस्तुत: विकास की बयार का रुख ही कुछ ऐसा है कि हम ग्रामीण भी अपनी उन्नति का मानक मोबाइल,वाह्य व्यक्तित्व/साज-सज्जा और विलासिता मानने लगे हैं. भूलते जा रहे हैं कि आर्थिकी रीढ़ तो कृषि है,उद्यम ही सर्वसाधन है. गाँवों का शहरीकरण जिस गति से हो रहा है उससे कही तीव्र गति से मानसिकता बदल रही है वो भी पश्चिमी तर्ज पर. विकास की धुरी कहीं भी घूमती हो पर विश्व का मूल आधार प्राथमिक उत्पादों पर हा टिका है. जिनके लिए हमे कृषि/प्रकृति और उद्यम का सहारा लेना ही पड़ेगा. परन्तु कृषि के साथ उद्यम करना परम्पराओं का अनुसरण करना तो वर्तमान में पिछड़ेपन का कारण और विकास का अवरोधक माना जाने लगा है. गाँवों के अवलोकन के बाद देश के लिए 'लोकत्न्त्रिक' शब्द मिथ्या सा लगने लगता है. वहाँ बोट बहुत से लोग डालते हैं,तो इस लिए कि 'सब डालते हैँ' न कोई विकास की अपेक्षा न किसी सुविधा की आशा. विपन्नता,अपराध,खुराफात गाँवों के अभिन्न अंग हैं. आज भी,जब हम आंकड़ें देख गौरवान्वित होते हैं, गलियारे कीचड़ से डूबे हुए हैं. मनरेगा की अपूर्व सफलता के बाद भी कोनों मे जुएं के फड़ प्राय: लगे रहते हैं-खाली हैं क्योंकि उनके पास 'जाब कार्ड' नहीं है,खेती मे जितना पैदा होता है उससे ज्याद लग जाता है,डी.ए.पी. दुगने दाम की मिलने लगी है,उन्नत बीज भी तो उतना महंगा है. निम्न मूल्यों पर राशन उपलब्ध होने पर भी कई परिवारों मे एक बार ही भोजन बनता है,क्योंकि राशन के लेने के लिए राशनकार्ड ही नही है. कितनी कन्याएं कन्या विद्याधन ,साइकिल आदि सुविधाओं से वंचित हैं. अब कोई कहे कि ये BPL सूचियां आदि सब मिथ्या है क्या! तो बिलकुल नहीं,इन सुविधाओं और कार्डों का लाभ तो वो धनाड्य जन ले रहे हैं जो जीवन तो विलासिता का जी रहे हैं परन्तु अभिलेखों मे निर्धनतम् बने हुए हैं. ये तथ्य गौढ़ हैं और हम खुश हो रहे हैं देख के कि हर चरवाहे,मजदूर,जुआंरी,किशोर,प्रौढ़ की जेब मोबाइल से झन्कृत हो रही है. इस खोखले उत्थान के बारे मे क्या कहा जाए,मेरी समझ से परे है. मैं कोई कपोल कल्पत बात नहीं कर रही बल्कि देखा हुआ और जिया हुआ वर्णित कर रही हूं. मेरा अपना गाँव-साखिन,वि.क्षे.-टड़ियावां,पड़ोस के गाँव बरबटापुर,ढपरापुर,पहाड़पुर,गोपालपुर मुझे यही अनुभव प्रदान करते हैं. सुने और पढ़े आंकड़ों पर विश्वास कैसे कर लूं? वन्दना तिवारी,साखिन

Tuesday, January 8, 2013

जिन्दगी को क्या राह दूं


आजाद हूं...
जिन्दगी को क्या राह दूं?
खो दिया है खुद को ही,
पग भूमि से ही उठ गये।
लुट रही है रोज अस्मत.
इतने विकसित हो गये।
खो जाउं मैं भी आवेश में,
या बदलाव को अंजाम दूं?
आजाद हूं...

सहमे हुए हैं साये,
यूं आजादी की अंगड़ाइयां।
क्या मश्विरे, क्या सरहदें,
उत्थान की पुर्वाइयां हैं!
क्या अनुसरण उस इतिहास का,
अब तो ये सब रूढ़ियां।
गिर जाएंगे भी यदि खड्ड मे,
सैलाब सड़क पर आएगा ही।
उस ज्वार की तीव्रता से
क्या दरारें जिगर की भर पाएंगी?
बचालूं खुद को गिरने से 
या आक्रोश को हवा दूं?
आजाद हूं पर जिन्दगी को क्या राह दूं...

Saturday, January 5, 2013

न जागे हो ते जागो

मेरा संदेश है यह,
कठिन परिवेश है यह,
समस्या की घड़ी है
मेरे आगे खड़ी है।
जो तू न जाग पाया
क्या होगा हाथ आया!
जरा सा जान खुद को,
जरा पहचान खुद को,
तू अप्रतिम एक योद्धा
तो फिर किस भाँति सुविधा!
कदम भर बस बढ़ा दो...
न जागे हो तो जाग जाओ।।

 दिया क्या तूने जग को
 न ये कर सोंच मन में
 तू कर कुछ काम ऐसा
 न हो फिर कभी जैसा
 ये पथ तेरे लिए है
 तू इस पथ का पथिक है
 न रुक तू एक भी क्षण
 हो बस तेरा यही प्रण
 यही बस आस सबको
 दिया क्या तूने जग को हो
उत्तर यदि सुना दो
 न जागे हो तो जाग जाओ....
             - गोविन्द बाजपेई