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Monday, February 10, 2014

बोल,भावों के विहंगम!

तेरे  फड़फड़ाते पंखों की छुअन से,
ऐ परिंदे!
हिलोर आ जाती है
स्थिर,अमूर्त सैलाब में,
छलक जाता है
चर्म-चक्षुओं के किनारों से
अनायास ही कुछ नीर.

हवा दे जाते हैं कभी
ये पर तुम्हारे
आनन्द के उत्साह-रंजित
ओजमय अंगार को,
उतर आती है
 मद्धम सी चमक अधरोष्ठ तक,
अमृत की तरह.

बिखरते हैं जब,
सम्वेदना के सुकोमल फूल से पराग
तेरे आ बैठने से
चेतना फूँकती है सुगंधी
जड़, जीर्ण और...अचेतन में.

बोल,भावों के विहंगम!
है कहाँ तेरा घरौंदा?
कण-कण में या हृदय में,
या फिर दूर...
यथार्थ के उस यथार्थ में
जो,कई बार अननुभूत रह जाता है.

-विन्दु

7 comments:

  1. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति, धन्यबाद .

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    1. आपका हार्दिक आभार आदरणीय राजेन्द्र प्रसाद जी

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  2. बहुत ही प्रभावशाली रचना है आपकी. बहुत अच्छी लगी.

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    1. आपका बहुत आभार रंजन जी।
      सादर

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  3. ऐसी सुन्दर रचना कभी-कभी ही मिलती है। साधुवाद।

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    1. सादर आभार आदरणीय निकोर सर।
      आपकी उपस्थिति से आत्मबल मिला।
      सादर

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  4. कोमल भाव लिए सुन्दर भावपूर्ण रचना...

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