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Tuesday, April 29, 2014

जय हो

 आज जग की नाड़ियों में
चाह जय की
समाई इस तरह
स्व भी रौंदा,पर को कुचला
न रही पथ की खबर.

अपरिमित,कंटीली राह के
उस छोर पर
जो चमकता लक्ष्य-जय
बस! उसी पर नज़र
पग पगी नीरस थकन

लमकन बिखेरी
शांति झुलसे,क्रांति उपजे
जिस कौंध में
बोध है
जय हो वो कैसी?

भुस पे लीपी सी
कहीं ये जय न हो
इन्द्रियों की तुष्टि,चादरमें ढके
आत्मा के सजल से
नैन न हों

पहचान हो सत लक्ष्य की
आवर्त,पथ के
भास फिर शूल न हों
प्रिय लगे
खोखली जय-गूंज से परे
स्नेह भीगी नाद नीरव

-विन्दु

9 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (30-04-2014) को ""सत्ता की बागडोर भी तो उस्तरा ही है " (चर्चा मंच-1598) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    Replies
    1. आपका हार्दिक आभार आदरणीय।
      सादर

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  2. पहचान हो सत लक्ष्य की
    आवर्त,पथ के
    भास फिर शूल न हों
    प्रिय लगे
    खोखली जय-गूंज से परे
    स्नेह भीगी नाद नीरव
    ...बहुत सुन्दर मनोभाव ..
    सुन्दर प्रस्तुति

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    Replies
    1. आदरणीया कविता जी आपकी उपस्थिति से मेरा लेखन सार्थक हुआ।
      आपका बहुत धन्यवाद।

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  3. Replies
    1. शुक्रिया आशीष भाई।
      सादर

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  4. अर्थपूर्ण रचना ... शिपक और भाषा का चयन कमाल का ...

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    Replies
    1. आपका बहुत आभार आदरणीय नासवा जी।
      सादर

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  5. उपरोक्तानुसार लेखन में कही न कही इसमे दृढ निश्चिचता, उम्मीद की किरण उजागर करने हेतु अतुल्यनीय सराहनीय के पात्र है।

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