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Friday, December 7, 2012

स्वतन्त्रता पर बन्धन



अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार हैअभिव्यक्ति प्रेषित करने का माध्यम कला हैस्वरूप साहित्यफिल्मपेंटिंगकर्टून कुछ भी हो सकता हैकई बार स्वतन्त्रता ही कलाकार को मुसीबत के घेरे मे धकेल देती हैअधिकार का प्रयोग से कही किसी का फ़तवा जारी होता है तो कोई देश से ही निकाल दिया जाता हैकोई जेल भेजा जा रहा है कही हिंसा का विषय बन रहा हैकहते हैं साहित्य/कला समाज का दर्पण होता है फिर ये विषमताओं के लिए किसे जिम्मेदार माना जायअभिव्यक्ति को, सरकार को या जनसमुदाय कोआस्था को या बुद्धि को?
हाल ही मे इस्लाम पर बनी फिल्म 'इनोसेंस आफ मुस्लिम', जिसमे कथित तौर पर पैगम्बर मुहम्मद के खलाफ अपमानित भाषा के प्रयोग का आरोप लगाया गया हैइसको लेकर विश्व के कइ देशों में हिंसात्मक प्रदर्शन हुए हैं जिसके चलते कुछ लोगों को जाने भी गवांनी पड़ी हैंअसीम त्रिवेदी को ही देखे तो अभिव्यक्ति के कारण ही देशद्रोहसंविधान के अपमान आदि आरोपों को झेलना पड़ाअसीम का मानना है कि यदि सत्य बेलना देशद्रोह है तो मैं दोषी हूंवह कहते हैं-''हर घर में लोग शीशा टांगते हैं जिसको अपनी सूरत की जितनी चिन्ता होती है उतना ही बड़ा शीशा टांगता हैसाहित्यकला और कार्टूनये देश और समाज के आइना हैं आपको तरक्की देखनी है तो बड़ा शीशा टांगना होगा.''
तसलीमा नसरीन के विवादित लेखन के लिए दी गई प्रताड़ना की चर्चा तो जन-जन तक हैउन्हे विवादास्पद उपन्यासों (लज्जाऔर द्विखण्डितोके लिए बांग्लादेश ने निष्कासित ही कर दियाफिर भारत मे भी वे असिरक्षा की भावना से घिरी रहींअब भी वह इसी कारण से योरोप में कही अज्ञातवास मे रह रही हैंसलमान रुश्दी पर भी स्वतन्त्र लेखन के लिए बहुत भर्त्सना झेलनी पड़ीवह भारतीय मूल के ब्रितानी लेखक हैं उनका उपन्यास 'सैटेनिक वर्सेजफासा विवादित और चर्चित हैयह उपन्यास उन्होने 1980 मे लिखा था जिसके बाद विश्व भर के मुसलमानों ने विरोध प्रदर्शन किए और ईरान के धर्मगुरु अयातोल्ल् ख़ोमानी ने तो सीधे उनकी मौत के आदेश जारी कर दिये थेहाल ही लिखी आत्मकथा मे उन्होने खुलासा किया दै कि इस दौरान उन्हें भूमिगत भी होना पड़ा थारुश्दी कहते हैं- ''मुस्लिम बाहुल देशों में लेखकों को प्रताड़ित किया जाता हैसभी पर एक ही आरोप ईशनिंदाधर्मतिरस्कार... कुछ लोगों ने माना अभिव्यक्ति की आजादी होनी चाहिएअगर ऐसा है ते हम तनाव के वातावरण से बाहर आ सकते हैंनोबेल पुविजेता तुर्का साहित्यकार का भी मानना है- ''हमारे कई साथी पत्रकार और लेखक जेल मे समय बिता चुकेंहैं... पर तुर्की बोलने की आजादी देना नहीं चाहता''
अनेक मामले प्रासंगिक हैंजैसे भाजपा नेता जसवन्त सिंह द्वारा लिखित 'जिन्ना:इण्डिया पार्टिशन इडिपेंडेंस', जेम्स लेन की 'शिवाजी:हिन्दु किंग इन इस्लामिक इण्डियाडी.एचलारेन्सकाव्या विश्वनाथनकई फिल्में आदिलेखक अशोक बाजपेई इस सम्बन्ध मे राजनीति के दोषी ठहराते हुए विचार व्यक्त करते हैंप्रतिबन्ध लगाना कानूनू के अन्तर्गत आता है इसलिए जायज तो है लेकिन अनैतिक और अलोकतान्त्रिक हैसरकाक छोटे-छोटे समुदायें की बात मानती है क्योंकि बड़ा समुदाय चुप रहता है.सरकार इनके सामने घुटने टेक देती है...उन्हें लगता है यही जनमत है.''
कला उकेरने के लिए सूझ-बूझसद्विचार और भावनाओं को पिरेया जाता हैइसलिए इसके परिणाम रचनात्मक होने चाहिए ना कि विध्वंसात्मकचाणक्य नीति मे कहा गया है- 'बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेश्च कुतेबलम्'. कला का द्योतक बुद्धि है अत: 4स के परिणाम सुखद् हेने चेहिए भड़काउ या विद्रेही नहींनेपोलियन का मानना था ''दुनियां मे दो ही ताकतें हैकलम और तलवारअन्त मे विजय कलम की ही हेती है.'

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