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Wednesday, May 29, 2013

काँपते उर

संवेदना के
शुष्क तरु सानिध्य में,
पुष्प प्रीति के,
ढूंढे जा रहे हैं आज।
पत्थरों को ईश मान;
मंदिरों में घट बंधा,
घट-जलधार के पास से,
पिपासाकुल खग
भगाए जा रहे हैं।
प्रसाधन-जनित
यज्ञशाला की अग्नि में,
आँच के भय से
सब आहुति घटा रहे हैं।
सुना है,देखा नहीं
भगवान औ भूत दोनों को
पर...ईशास्था से अभय
को नकार
भूत में विश्वास कर
उर काँपते हैं आज।
-विन्दु

8 comments:

  1. आपकी यह रचना 31-05-2013 को http://blogprasaran.blogspot.in पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

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    1. आपने मेरी रचना को गति देकर वहाँ तक पहुंचाया इसके लिए आपका बहुत आभार आदरणीय!

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  2. आस्था-अनास्था पर कोमल शब्द-सेतु........

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    1. आदरणीय निगम महोदय आप मेरे ब्लाग पर पधारे,इसके लिए आपका हृदयातल से आभार।
      स्नेह बनाए रखें महोदय।
      सादर

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  3. गहन चिंतन से उपजी एक उत्कृष्ट रचना !

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    Replies
    1. आदरेया आप यहां पधारीं,मेरा रचनाकर्म सार्थक हुआ।
      स्नेह बनाए रखें।
      सादर

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  4. श्रेष्ठ रचना

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    Replies
    1. आपका बहुत आभार आदरणीय अभय जी!

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