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Thursday, July 18, 2013

'हो भान तो वह'

(बहर-2122 2122 2122)

लक्ष्य क्या जो खोजते हम दौड़ते हैं।
है कहाँ ये आज तक ना जानते हैं ।।

ढूंढ साधन,साधने को लक्ष्य सोंचा
ना सधा ये, सब स्व को ही रौंदते हैं।

जग छलावे में भटकते इस तरह हम
शांति के हित शांति खोते भासते हैं।

हो समर्पण पूर्ण या लब सीं लिए हों,
क्या शिलाए भी प्रेम को सीलते है ?

ना पहुंचू पर मुझे हो भान तो वह
तब बढेंगे, आज तो बस खोजते हैं।।
-विन्दु

7 comments:

  1. आपने लिखा....हमने पढ़ा....
    और लोग भी पढ़ें; ...इसलिए शनिवार 20/07/2013 को
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
    पर लिंक की जाएगी.... आप भी देख लीजिएगा एक नज़र
    लिंक में आपका स्वागत है ..........धन्यवाद!

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    Replies
    1. आपका बहुत शुक्रिया आदरेया।

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  2. Replies
    1. आदरणीय रंजन जी आपकी सराहना से रचना सार्थक हुई।
      मार्गदर्शन की सादर आकांक्षी हूं।
      सादर

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  3. बहुत ही गहरे और सुन्दर भावो को रचना में सजाया है आपने.....

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  4. बहुत सुन्दर गजल के लिए बधाई आद्र्नियाँ वंदना तिवारी जी

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