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Tuesday, January 8, 2013

जिन्दगी को क्या राह दूं


आजाद हूं...
जिन्दगी को क्या राह दूं?
खो दिया है खुद को ही,
पग भूमि से ही उठ गये।
लुट रही है रोज अस्मत.
इतने विकसित हो गये।
खो जाउं मैं भी आवेश में,
या बदलाव को अंजाम दूं?
आजाद हूं...

सहमे हुए हैं साये,
यूं आजादी की अंगड़ाइयां।
क्या मश्विरे, क्या सरहदें,
उत्थान की पुर्वाइयां हैं!
क्या अनुसरण उस इतिहास का,
अब तो ये सब रूढ़ियां।
गिर जाएंगे भी यदि खड्ड मे,
सैलाब सड़क पर आएगा ही।
उस ज्वार की तीव्रता से
क्या दरारें जिगर की भर पाएंगी?
बचालूं खुद को गिरने से 
या आक्रोश को हवा दूं?
आजाद हूं पर जिन्दगी को क्या राह दूं...

11 comments:

  1. बहुत खूबसूरत!

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  2. बहुत अच्छी रचना...
    गहन भाव लिए..

    अनु

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  3. बहुत शुक्रिया अनु जी.आपकी रचनाएं पढ़ के बहुत अच्छा लगा.

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  4. बिखरे जज्बातों को समेट कर बहुत ही खुबसूरती से सजा दिया..बहुत सुन्दर

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  5. आप सभी को सादर धन्यवाद!

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  6. भावपूर्ण प्रस्तुति.

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  7. शुक्रिया सक्सेना महोदय!

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  8. एक ऐसी नज़्म , जिसे पढ़ते हुए मैं कहीं खो सा गया हूँ . शब्द भीतर तक कहीं छु से गए है......

    दिल से बधाई स्वीकार करे.

    विजय कुमार
    मेरे कहानी का ब्लॉग है : storiesbyvijay.blogspot.com

    मेरी कविताओ का ब्लॉग है : poemsofvijay.blogspot.com

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